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वो आखिरी दिन था हमारा !

    खूब चहल पहल थी, कोई अपना बैग पैक कर रहा था, कोई अपनी किताबें इकट्ठी कर रहा था , कोई लाइब्रेरी की किताबें वापिस करने गया था, कोई कैंटीन के dues  दे  रहा था , कोई एक दूजे से लिया  उधार चुकता कर रहा था , कोई अपने दोस्तों के फोन नंबर व् address   नोट कर  रहा था ,सब व्यस्त थे और बेहद खुश भी ….आखिरी दिन था हमारा उस शहर में , उस कॉलेज में , उस हॉस्टल में ….अगले दिन सभी हॉस्टल students  को अपना अपना room  खाली करके अपने अपने घर लौटना था.. घर जाने की ख़ुशी इतनी थी कि  सभी कुछ न कुछ गुनगुनाते हुए अपने काम निबटा रहे थे ……. शाम को सब सहेलियां  free  होके एक ही कमरे में इकठ्ठे  बैठ गयीं… नेहा बोली — शुक्र है यार …पढ़ाई ख़त्म हुई , कल से आराम से अपने घर पर रहूंगी …मम्मी के हाथ का खाना खाउंगी …..वाह …आनंद आ जायेगा….पंखे की ओर देखती हुयी और  घर  पहुँचने  के सुंदर ख्यालों में बोली “Home  Sweet  Home  ” मैंने कहा — हाँ यार , घर से बाहर रहना कोई आसान काम नहीं है . Thank  GOD,  It’s our last day  here . नी...